लास्ट इयर जनवरी मैं हमारा सफर सुरु हुआ था। एक साल बीत चुके है। पाछे मुड़कर देखता हूँ तो लगता है जैसे कल की बात हो। कैसे टाइम बीत गया पता ही नही चला। सायद ख़ुद को एस्ताब्लिश करने मैं वक्त नही रहा वक्त को याद रखने का। ख़ुद को सबसे alag रखने के प्रयास न दिन याद रहा न रात। बस काम काम और काम। हेर दिन कुछ नया करने की चाहत ने हौसला दिया और गलती पर बॉस की माफ़ी ने ऐसा जोश भर दिया था की रोज नया करने की आदत सी पड़ गई। सोच को पंख लगाने का सायद इससे बड़ा कोई प्लेटफोर्म मिलना भी मुस्किल होगा। येही से मिला कोम्पटेशन फस करने का आत्मविश्वास। सोते जागते चलते हेर वक्त कुछ न कुछ दिमाग मैं चलता रहता था। इसमे मेरे फ्रिएंड्स ने भी पुरा साथ दिया। वो गलती बताने के साथ ही मुझे अपने सोच भी बताते थे। आईडिया भी देते थे। जाने अनजाने उनकी बातें मुझे कुछ न कुछ दे ही जाती थी। अलाहाबाद के बाद पटना रांची और आगरा के दौरे ने एक्सपेरिएंस के साथ कांफेदेंस भी भरा। इसके बाद तो मुड़कर देखने काम मन भी नही करता। बस इसी सोच मैं दिन बीत जाता है की आज क्या नया कर सकता हूँ। सुच बतौऊ तो येहे टाइम के पता न चलने काम कारन भी था। फर्स्ट एनिवर्सरी सेलेब्रेट करते समय एक सुखद अहसास मेरे साथ था। नया जोश नई उम्मीद नया भरोसे के साथ मैंने दूसरे साल मैं प्रवेस कर लिया है। उम्मीद है इस बार भी दोस्तियो काम पुरा साथ मिलेगा और अगले साल नई ऊंचाई पर पहुचुन्गा।Friday, February 13, 2009
एक साक के हो गए हम
लास्ट इयर जनवरी मैं हमारा सफर सुरु हुआ था। एक साल बीत चुके है। पाछे मुड़कर देखता हूँ तो लगता है जैसे कल की बात हो। कैसे टाइम बीत गया पता ही नही चला। सायद ख़ुद को एस्ताब्लिश करने मैं वक्त नही रहा वक्त को याद रखने का। ख़ुद को सबसे alag रखने के प्रयास न दिन याद रहा न रात। बस काम काम और काम। हेर दिन कुछ नया करने की चाहत ने हौसला दिया और गलती पर बॉस की माफ़ी ने ऐसा जोश भर दिया था की रोज नया करने की आदत सी पड़ गई। सोच को पंख लगाने का सायद इससे बड़ा कोई प्लेटफोर्म मिलना भी मुस्किल होगा। येही से मिला कोम्पटेशन फस करने का आत्मविश्वास। सोते जागते चलते हेर वक्त कुछ न कुछ दिमाग मैं चलता रहता था। इसमे मेरे फ्रिएंड्स ने भी पुरा साथ दिया। वो गलती बताने के साथ ही मुझे अपने सोच भी बताते थे। आईडिया भी देते थे। जाने अनजाने उनकी बातें मुझे कुछ न कुछ दे ही जाती थी। अलाहाबाद के बाद पटना रांची और आगरा के दौरे ने एक्सपेरिएंस के साथ कांफेदेंस भी भरा। इसके बाद तो मुड़कर देखने काम मन भी नही करता। बस इसी सोच मैं दिन बीत जाता है की आज क्या नया कर सकता हूँ। सुच बतौऊ तो येहे टाइम के पता न चलने काम कारन भी था। फर्स्ट एनिवर्सरी सेलेब्रेट करते समय एक सुखद अहसास मेरे साथ था। नया जोश नई उम्मीद नया भरोसे के साथ मैंने दूसरे साल मैं प्रवेस कर लिया है। उम्मीद है इस बार भी दोस्तियो काम पुरा साथ मिलेगा और अगले साल नई ऊंचाई पर पहुचुन्गा।Wednesday, February 11, 2009
स्नो फाल का वैलेंटाइन

नेचुरल ब्यूटी ऐसे sazi थे मानो वैलेंटाइन सेलेब्रेट कर रही हो। उसे किसी की परवाह नही थी। हम तो मसूरी गए थे नेचुरल ब्यूटी को एन्जॉय करने। वैलेंटाइन वीक मैं ही यहाँ ऐसा क्यो होता है यह जानने के लिय। यहाँ का नजारा ही कुछ और था। स्नो से घिरी पहेरी। सुब कुछ बर्फ मैं लिपटा वैलेंटाइन डे सेलेब्रेट कर रहा था। किसी की कोई चिंता नही और न ही किसी का खौफ। यहाँ हजरिओं लोग नेचर को एन्जॉय करने के लिय जमा थे। कहने को तो कल किस डे था पैर यहाँ तो वैलेंटाइन का हेर डे सेलेब्रेट करने वाले थे। उमर कोई मायने नही थे। यहाँ जाने का मकसद तो था कुह एक्सक्लूसिव तलास करना पैर लोगिओं का मूड देखकर मेरा भी मूड बदल गया और मैं अपने को रोक नही पाया। यहाँ किसी के पास कोई गम नही था हर फेस पैर मुस्कान थे जो इस रिसेशन के दौर ने छीनली है। हर कोई इस पल को जी लेना चाहता था। क्या बच्चे और जवान ऐसा लगा जैसे किसी के पास कोई काम ही नही है। यह देख कर लगा इससे एक्सक्लूसिव और क्या हो सकता है। यही तो है हमारी वो बात जो हमारी हस्ती को मिटने नही देती। बर्फ से खलते लोग जाम से निकलने की जुगत कुछ भी करने सहने के लिय तैयार लोग। कोई यह भी देखने वाला भी नही की सामने वाला कौन है। यहाँ बेगाने भी अपने थे। सेलेब्रेट करते बर्फ भी सूरज की किरणों को देख कर अपने आप को पिघलने से रोक नही पाती थी। सफ़ेद चादर पैर भला कौन मस्ती नही करना चाहेगा वो भी तब जब की नेचर ख़ुद इसमे सामिल था। हम तो देखकर दंग थे यह सुब कुछ। जौर्नी भी किसी mukable से कम नही थी। हर कोई जल्द से जल्द पहुचाना चाहता था। होड़ मची थे। क्या कार और क्या मोटर साइकिल कोई पीछे नही रहना चाहता था। यहाँ तो सीन किसी दौड़ से कम नही था। हम भी इस दौड़ मैं सामिल थे। यहाँ पहुँच कर लगा जीना तो यही है। और इससे बड़ा वैलेंटाइन सेलेब्रेशन और क्या होगा। 
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