Friday, February 13, 2009

एक साक के हो गए हम

लास्ट इयर जनवरी मैं हमारा सफर सुरु हुआ था। एक साल बीत चुके है। पाछे मुड़कर देखता हूँ तो लगता है जैसे कल की बात हो। कैसे टाइम बीत गया पता ही नही चला। सायद ख़ुद को एस्ताब्लिश करने मैं वक्त नही रहा वक्त को याद रखने का। ख़ुद को सबसे alag रखने के प्रयास न दिन याद रहा न रात। बस काम काम और काम। हेर दिन कुछ नया करने की चाहत ने हौसला दिया और गलती पर बॉस की माफ़ी ने ऐसा जोश भर दिया था की रोज नया करने की आदत सी पड़ गई। सोच को पंख लगाने का सायद इससे बड़ा कोई प्लेटफोर्म मिलना भी मुस्किल होगा। येही से मिला कोम्पटेशन फस करने का आत्मविश्वास। सोते जागते चलते हेर वक्त कुछ न कुछ दिमाग मैं चलता रहता था। इसमे मेरे फ्रिएंड्स ने भी पुरा साथ दिया। वो गलती बताने के साथ ही मुझे अपने सोच भी बताते थे। आईडिया भी देते थे। जाने अनजाने उनकी बातें मुझे कुछ न कुछ दे ही जाती थी। अलाहाबाद के बाद पटना रांची और आगरा के दौरे ने एक्सपेरिएंस के साथ कांफेदेंस भी भरा। इसके बाद तो मुड़कर देखने काम मन भी नही करता। बस इसी सोच मैं दिन बीत जाता है की आज क्या नया कर सकता हूँ। सुच बतौऊ तो येहे टाइम के पता न चलने काम कारन भी था। फर्स्ट एनिवर्सरी सेलेब्रेट करते समय एक सुखद अहसास मेरे साथ था। नया जोश नई उम्मीद नया भरोसे के साथ मैंने दूसरे साल मैं प्रवेस कर लिया है। उम्मीद है इस बार भी दोस्तियो काम पुरा साथ मिलेगा और अगले साल नई ऊंचाई पर पहुचुन्गा।

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