
एक वो राजू था, jentelman सा दिखने वाला। लोगों के खुशी मईअपनी खुसी तलासने वाला। सिम्पल सा दिखने वाला। बात कर रहा हूँ राजू बन गया जेंतेलमन की। कुह ऐसा हे अंदाज था सत्यम को लेकर आने वाले राजू के। अपने गोअंके लोगों के लिया क्या नही किया। देश मई भी पैठ बनाई। क्या फिल्मी राजू के तेरह सत्यम के राजू को भी पैसो से खलने का शगल था। असलियत सामने है। सुच जो भी हो पैर पूरी कहानी का ट्विस्ट तो जेंतेलमन राजू जैसा ही है। अपने ही लोगो के बीच बेगाना हो गया है। येही तो दौलत थी जोपैर पैसो के आंधी ने रेत जमा दी थे। क्यो नही समाज पाया राजू। या समाज कर भी भुला दिया। दोनों हे इस्तिथि ख़राब है। खतरनाक bhavisya का संकेत भी। समय आ गया है ख़ुद को टायर करने का। ख़ुद से सवाल करने का की पैसे के चक्कर मैं हम ख़ुद भी तो राजू नही बन बैठे थे और सुब कुह गवां बैठे।

i remember this movie, its like way old.
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