Monday, May 4, 2009
कहां जा रहे हैं हम
2 मई की बात है. सिटी में एक केस सामने आया. एक पेयर चार साल तक लिव इन रिलेशन में पति-पत्नी की तरह रहा. दोनों एक ही कंपनी में काम करते थे. वेस्टर्न एल्चर से प्रभावित होकर यह कदम उठाने वाली लड़की रिश्ता टूटने का समय आया तो भारतीय परम्परा से जुड़ गई और राजीव नाम के इस लड़के को छोड़कर किसी को अपना जीवनसाथी मानने के लिए तैयार नहीं थी. लड़के ने ऐसा करने से मना कर दिया तो उसने दो बार जान देने की कोशिश की. अब वह जीवन और मौत के बीच संघर्ष कर रही है. आधुनिकता के नाम पर तेजी से वेस्टर्न कल्चर को एडाप्ट करने का इससे बड़ा कोई और उदाहरण शायद हो भी नहीं सकता है. इस घटनाक्रम से दो फैक्ट उभरकर सामने आए हैं. एक, हम अधकचरी संस्कृति को मानने में विश्वास करने लगे हैं और दूसरा हमारा मै'योरिटी लेवल कहां जा पहुंचा है. अधकचरी संस्कृति इसलिए क्योंकि वेस्टर्न कंट्रीज में लिव इन रिलेशनशिप में रहने को कैजुअली ही लिया जाता है. शायद यही कारण है कि वहां तलाक का ग्राफ तेजी से ऊपर उठाता हुआ दिखाई देता है. इसे वहां सीरियसली लिया भी नहीं जाता है. हमारे यहां वैवाहिक मशीनरी तमाम झंझावातों को झेलने के बाद भी काफी स्ट्रंाग पोजीशन में है. यही कारण है कि एक बार वैवाहिक बंधन में बंधने के बाद सोसाइटी के चलते कोई भी कपल रिश्ता तोडऩे से पहले सैकड़ों बार सोचता है. वैवाहिक मशीनरी न सिर्फ लड़की-लड़की बल्कि दोनों के पूरे फैमिली रिलेशन को भी बताती है. दोनों पक्षों को पूरी आजादी होती है कि वे एक-दूसरे के बारे में पूरा पता लगा लें. इसी का नतीजा होता है कि रिश्तों में खटास का असर सिर्फ दो व्यक्तियों पर नहीं पड़ता बल्कि उसका असर काफी दूर तक जाता है. लिव इन रिलेशनशिप की घटना यहां एक सवाल और खड़ा करती है कि पेरेंट के रूप में हमारी भूमिका कितनी संकुचित हो गई है. बेटा हो या फिर बेटी. किसी अजनबी के साथ चार सालों से रही और पेरेंट्स को इसका पता भी नहीं चला. क्यों? क्या हम अपने आप में इतने बिजी हो गए हैं कि ब''ो क्या कर रहे हैं, इसका पता लगाना भी जरूरी नहीं समझते? और यदि समझा तो क्या किया. शायद कुछ नहीं. क्योंकि कुछ किया होता तो शायद यह दिन देखने की नौबत ही नहीं आती. ऐसा इसलिए क्योंकि लड़की ने जैसा बताया उसके मुताबिक उसके माता और पिता दोनों लाइव हैं और उसका घर से भी रिश्ता बना हुआ है. उसने यह भी कहा कि वह मुंबई तक राजीव से मिलने अकेले ही गई थी तब उसे पता चला कि राजीव अब उससे कोई संबंध नहीं रखना चाहता. यह तब था जबकि लड़की का चार बार एबार्सन कराया गया और हर बार डॉक्टर के यहां सिग्नेचर राजीव का ही था. इतना सब कुछ हो गया और मां-बाप को पता नहीं चला? हो सकता है, यह संभव हो पर सोचने में ऐसा पॉसिबल नहीं लगता क्योंकि लड़के के मामले में हम भले ही थोड़े लापरवाह हो गए हों, लड़की के बारे में तो ऐसा नहीं ही सोचते. यहां समस्या यह भी है कि हम दो संस्कृतियों के बीच आखिर फंस क्यों रहे हैं. आधुनिकता पर मुझे कोई एतराज नहीं है लेकिन आधुनिकता के नाम पर ऐसी घटनाएं थोड़ा कष्टï जरूर दे जाती हैं. यह घटनाक्रम एक और सवाल खड़ा करता है, हमारे मै'योरिटी लेवल पर. हम बदलने की कोशिश तो डे बाई डे की तर्ज पर कर रहे हैं लेकिन इस लेवल की मै'योरिटी हमारे भीतर नहीं है. ऐसा होता तो राजीव के लिए जान देने की कोशिश करने से पहले लड़की हजारों बार सोचती. सोचती तो यह उसके मन में जरूर आता कि उसके इस कदम से उसके पेरेंट््स की सोसाइटी में क्या इज्जत रह जाएगी. हमाम बदलावों के बावजूद आज भी हमारा सोशल सिस्टम काफी स्ट्रांग है और मैं तो इस पर पूरा भरोसा इसलिए भी करता हूं क्योंकि यह हमें रोकता-टोकता तो है. हो सकता है कि मेरी ही सोच सही हो, पर सोशल सिस्टम मुझे गलत सही के बारे में बताता तो है. यदि हम इस सोसल सिस्टम को इग्नोर करने की कोशिश कर रहे हैं तो उसी लेवल की मै'योरिटी भी तो दिखानी चाहिए. मैं यह कतई कहने की कोशिश नहीं कर रहा कि सौ फीसदी लड़की ही गलत है लेकिन 10 परसेंट हिस्सा तो उसके खाते में आता ही है. राजीव ने मौके का फायदा उठाया, इसमें दो राय नहीं है. लेकिन गलती तो लड़की की भी है कि उसने मौका दिया. मै'योर होता तो पहले जीवनसाथी बनाने की बात करती और फिर किसी संबंध पर बात करती.
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