Monday, May 4, 2009

पहले तो मुझ पर इतराना
प्यार नहीं था तो क्या था
फिर तेरी आंखें भर aanaa
pyaar नहीं था तो क्या था...
केवल एक वरदान मिला था
उसमें मांग लिया तुझको
हर कीमत पर उसको पाना
प्यार नहीं था, तो क्या था...
जब-जब दान किया यह मांगा
इसका पुण्य मिले तुझको
दिल का दिल को ये नजराना
प्यार नहीं था तो क्या था...
दिल बोला मैं आऊं
तन समझाये मत जाना
इस दुविधा का बोझ उठाना
प्यार नहीं था तो क्या था

3 comments:

  1. प्यार में कितनी दुविधा होती है, '
    दिल कुछ कहता है,
    दिमाग कुछ और ही कहता है,
    ठहरो मत आगे चलो
    कोई मिल जायेगा इसी प्यार के बहाने

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  2. pyar bahut kuch hota hai jo jaise samjhe.....
    mera anubhava pyar na ho to jyada thik hai nahi to kavi to ban hi jayega.

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